जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया : पत्रकारिता का संकट केवल मीडिया का नहीं, पूरे लोकतंत्र का
Raj Kumar Luniya
Sun, Jun 14, 2026
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया और पत्रकारिता के बदलते स्वरूप तथा वर्तमान धरातलीय वास्तविकताओं पर जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (रजि.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुराग सक्सेना ने गहरा नीतिगत आत्ममंथन किया है। एक राष्ट्रीय गोष्ठी के दौरान अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता और समाज के बीच एक मजबूत सेतु का कार्य करना तथा जनता की आवाज को शासन-प्रशासन तक निष्पक्षता से पहुंचाना है। परंतु आज की धरातलीय सच्चाई बेहद चिंताजनक है।

दबावों के बीच घुट रही निष्पक्षता : डॉ. सक्सेना ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि वर्तमान दौर में बहुत कम पत्रकार और मीडिया संस्थान अपने मूल स्वरूप को बचाए रखने में सफल हो पा रहे हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, वर्तमान में केवल 20 से 25 प्रतिशत पत्रकारिता ही अपने वास्तविक सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन कर रही है, वह भी अनेक अज्ञात भयों, चुनौतियों और संस्थागत दबावों के बीच। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर वह कौन-सा भय है जो राष्ट्र के चौथे स्तंभ को भीतर ही भीतर कमजोर कर रहा है? क्या यह राजनीतिक दबाव है, आर्थिक निर्भरता है, विज्ञापनों की मजबूरी है, या फिर बढ़ते मुकदमों और धमकियों का परिणाम है?

कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा आज का पत्रकार : गोष्ठी में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि आज का पत्रकार कई मोर्चों पर एक साथ संघर्ष करने को विवश है। एक तरफ जहाँ उसे सत्य को सामने लाने का अपना नैतिक दायित्व निभाना है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर आर्थिक असुरक्षा, व्यक्तिगत जोखिमों और संस्थागत दबावों का सामना भी करना पड़ रहा है। इन कठिन परिस्थितियों के चलते अनेक पत्रकार विवश होकर समझौतों का मार्ग चुन लेते हैं, जबकि कुछ साहसी पत्रकार तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आज भी सत्य की मशाल जलाए हुए हैं।
यह पूरे समाज और लोकतंत्र का संकट : जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि पत्रकारिता का यह संकट महज किसी संस्था या पत्रकारों का संकट नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर पूरे लोकतंत्र का संकट है। जब समाचार निष्पक्ष नहीं होंगे और जनहित के मुद्दे हाशिए पर चले जाएंगे, तो समाज सही दिशा में निर्णय लेने की क्षमता खोने लगेगा। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना केवल मीडिया जगत की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे सजग समाज का परम कर्तव्य है।
समय की मांग है कि पत्रकारिता अपने मूल मूल्यों—सत्य, निष्पक्षता, साहस और जनहित—की ओर पुनः लौटे। साथ ही, व्यवस्था को भी पत्रकारों के लिए एक सुरक्षित और स्वतंत्र वातावरण उपलब्ध कराना होगा ताकि वे बिना किसी भय या दबाव के अपना कर्तव्य निभा सकें। चौथे स्तंभ की मजबूत नींव ही लोकतंत्र की इमारत को सुरक्षित रख सकती है।
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