जिस उत्सव का उद्देश्य सामाजिक एकजुटता, आत्मिक शुद्धि और भगवान श्रीगणेश की आराधना था, वह अब पूरी तरह फूहड़ मनोरंजन और इवेंट बाजी की भेंट चढ़ चुका है। शहर में कई स्थानों पर विघ्नहर्ता के नाम पर स्थापित पंडालों में भक्ति की जगह क्लब जैसा माहौल देखने को मिल रहा है। कहीं खुलेआम 'कपल गरबा' आयोजित हो रहा है तो कहीं द्विअर्थी और फूहड़ फिल्मी गीतों पर डांडिया डांस का दौर देर रात तक चल रहा है।
आरती सिर्फ औपचारिकता, असली मकसद मनोरंजन: पंडालों में सुबह-शाम की आरती अब केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। जैसे ही आरती समाप्त होती है, भक्तिमय माहौल पूरी तरह बदल जाता है। लाउडस्पीकरों और कानफोड़ू डीजे पर अश्लील व फूहड़ गानों की धुनें गूंजने लगती हैं। धार्मिक आयोजनों में जिस शालीनता और पारंपरिक वेशभूषा की दरकार होती है, उसकी जगह अमर्यादित नृत्य और हुड़दंग ने ले ली है। भगवान की प्रतिमा के ठीक सामने 'कपल गरबा' और डांडिया नाइट्स के नाम पर युवाओं की भीड़ जुटाकर धार्मिक गरिमा की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
संस्कृति के तथाकथित रक्षकों की चुप्पी: सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो संगठन छोटे-मोटे मुद्दों पर संस्कृति की रक्षा का झंडा उठाकर सड़कों पर उतर आते हैं, वे गणेश उत्सव के नाम पर सार्वजनिक रूप से परोसी जा रही इस फूहड़ता पर पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। पंडालों में चल रहे इस खुले तमाशे पर न तो आयोजकों को कोई टोक रहा है और न ही तथाकथित धर्म रक्षक आगे आकर इसका विरोध कर रहे हैं। इस दोहरे रवैये से जागरूक और धार्मिक प्रवृत्ति के आम नागरिकों में भारी रोष है।
नियम-कानून ताक पर, आमजन परेशान: सुप्रीम कोर्ट के 85 डेसिबल की ध्वनि सीमा और रात 10 बजे लाउडस्पीकर बंद करने के स्पष्ट आदेशों को पैरों तले रौंद दिया गया है। देर रात तक फूहड़ गीतों की गूंज और सड़क घेरकर हो रहे डांडिया डांस से आसपास रहने वाले बुजुर्ग, बीमार और छात्र बुरी तरह त्रस्त हैं। वहीं, रतलाम पुलिस की 'शांति दूत' जैसी हेल्पलाइन सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गई है, जहां फोन करने पर भी कोई राहत नहीं मिलती। आस्था के नाम पर मर्यादा का यह खुला हनन अब सीधे तौर पर सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक स्वरूप को दूषित कर रहा है।